अध्याय 3: लखनवी अंदाज़
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न और उत्तर
प्रश्न अभ्यास (पृष्ठ संख्या 86-87)
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लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं हैं?
लेखक को नवाब साहब के निम्नलिखित हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं हैं:
- लेखक के डिब्बे में प्रवेश करते ही नवाब साहब ने उन्हें देखा, पर तुरंत ही उनकी नजरें खीरों की ओर लौट गईं, जिससे लगा कि वे लेखक की ओर ध्यान नहीं देना चाहते।
- उन्होंने लेखक को देखकर कोई उत्सुकता नहीं दिखाई, और कोई शिष्टाचार का अभिवादन भी नहीं किया।
- वे अपनी पालथी मारकर बैठे रहे और अपनी नज़रें झुकाए रहे, मानो लेखक वहाँ है ही नहीं।
- उनके चेहरे पर एक तरह की अनमनी उदासीनता थी, जिससे लगा कि वे अकेले रहना पसंद कर रहे हैं।
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नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? उनका ऐसा करना उनके किस स्वभाव को दर्शाता है?
नवाब साहब ने बहुत ही यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, और अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा निम्नलिखित कारणों से किया होगा:
- दिखावा और नवाबी शान: वे लेखक के सामने अपनी नवाबी शान का प्रदर्शन करना चाहते थे। वे यह जताना चाहते थे कि खीरा जैसी साधारण वस्तु उनके स्तर की नहीं है, जिसे खाया जाए।
- कृत्रिमता: वे अपनी बनावटी जीवनशैली को बनाए रखना चाहते थे। उन्हें लगा होगा कि यदि वे सहयात्री (लेखक) के सामने खीरा खाएंगे तो उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी, क्योंकि खीरा आम आदमी खाता है।
- अनापत्ति: शायद उन्होंने लेखक को खीरा देने की पेशकश की थी, जिसे लेखक ने मना कर दिया। अब वे स्वयं भी खीरा खाने की अपनी स्वाभाविक इच्छा को दबाना चाहते थे ताकि वे 'आम आदमी' न दिखें।
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बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है? यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?
यशपाल ने नवाब साहब के खीरा सूँघकर फेंकने की घटना के बाद व्यंग्यपूर्वक यह विचार प्रस्तुत किया कि "जब खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना मात्र से पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के क्या कहानी नहीं लिखी जा सकती?"
मैं यशपाल के इस विचार से **पूरी तरह सहमत नहीं हूँ**, लेकिन उनके व्यंग्य के पीछे के तर्क को समझता हूँ।
**असहमति का कारण:**- **कहानी का मूल ढाँचा:** किसी भी कहानी के लिए विचार (विषय-वस्तु), घटनाक्रम (प्लाट), और पात्र (जो कहानी को आगे बढ़ाते हैं) आवश्यक होते हैं। इनके बिना कहानी एक नीरस वर्णन या कल्पना मात्र रह जाएगी, उसमें गति और गहराई नहीं होगी।
- **पाठक का जुड़ाव:** पात्रों के बिना पाठक किसी से जुड़ नहीं पाता, घटनाओं के बिना कहानी आगे नहीं बढ़ती, और विचार के बिना कहानी का कोई संदेश या उद्देश्य नहीं होता।
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नवाब साहब द्वारा खीरा खाने के तरीके को अपने शब्दों में लिखिए।
नवाब साहब ने खीरा खाने का एक अत्यंत ही विलक्षण और दिखावटी तरीका अपनाया। उन्होंने पहले खीरों को पानी से धोया, फिर तौलिए से बहुत एहतियात से पोंछा। इसके बाद उन्होंने खीरे के दोनों सिरे काटे और उन्हें रगड़कर झाग निकाला, मानो वे बहुत ही मूल्यवान चीज़ हों। फिर उन्होंने बड़े सलीके से खीरों को छीला और उनकी फाँकों को करीने से तौलिए पर सजा दिया। इसके बाद उन्होंने प्रत्येक फाँक पर नमक, मिर्च और जीरा बड़ी सावधानी से छिड़का। जब सारा खीरा तैयार हो गया, तो उन्होंने लेखक को एक बार फिर से खीरा खाने के लिए पूछा। लेखक के मना करने पर, नवाब साहब ने एक-एक करके खीरे की फाँकों को उठाया, उसे अपने होंठों तक ले गए, सूँघा और नाक के पास ले जाकर उसकी गंध का आनंद लिया। उनके मुँह में पानी आ गया, लेकिन उन्होंने उस फाँक को खाया नहीं, बल्कि उसे खिड़की से बाहर फेंक दिया। इस प्रकार, उन्होंने सभी फाँकों को एक-एक करके सूँघा और बाहर फेंकते चले गए। अंत में, उन्होंने तौलिए से अपने हाथ पोंछे और संतोष के साथ लेट गए, जैसे कि उन्होंने खीरा खा लिया हो। यह पूरा तरीका उनकी दिखावटी और नवाबी सोच को दर्शाता है।
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आप इस कहानी को और क्या नाम देना चाहेंगे?
मैं इस कहानी को कुछ अन्य नाम देना चाहूँगा, जो इसके केंद्रीय विषय (दिखावा और व्यंग्य) को उजागर करते हैं:
- **दिखावे की दुनिया**
- **आडंबरों का सच**
- **फर्जीपन का अंदाज़**
- **सूँघने से पेट भरता है?**
- **नवाब का पाखंड**
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